इंतज़ार-ए-दास्तान
Shayari
दर्द भी अजीब मेहमान है साहब,
जाते-जाते घर का पता याद कर जाता है।
टूटना भी एक हुनर है ऐ दोस्त,
हर टुकड़े में एक नई रौशनी उतरती है।