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राज़-ए-दिल… और एक उम्मीद
अनकहे जज़्बातों का इक़रारनामा
दिल के भीतर एक कमरा है,
जिसकी चाबी किसी को नहीं दी।
उसमें रखे हैं वो सब अल्फ़ाज़,
जो कहते-कहते रुक गए थे।
कुछ ख़त हैं जो कभी भेजे नहीं गए,
कुछ नाम हैं जो कभी पुकारे नहीं गए,
और एक दुआ है — बहुत पुरानी —
जो हर रात नई हो जाती है।
लोग कहते हैं राज़ बोझ होते हैं,
मगर मेरे राज़ मेरी रौशनी हैं।
इन्हीं के सहारे मैं अंधेरों में
अपना रास्ता पहचानता हूँ।
और उम्मीद?
उम्मीद वो चराग़ है जिसे हवा
बुझाना चाहती है, हर रोज़,
और हर रोज़ नाकाम लौट जाती है।