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इंतज़ार से आगे…
जब ठहरना भी एक सफ़र बन जाए
इंतज़ार सिर्फ़ किसी के आने का नाम नहीं होता,
कभी-कभी वो अपने ही लौट आने का नाम होता है।
मैंने बरसों उस मोड़ पर खड़े होकर देखा,
जहाँ से तुम गए थे — और वहीं से वक़्त भी गया।
हर शाम मैं वहीं लौटता रहा,
जैसे कोई परिंदा अपने उजड़े घोंसले पर।
फिर एक रोज़ चाँद ने पूछा,
"कब तक ठहरे रहोगे इसी दहलीज़ पर?"
मैंने कहा — जब तक दिल की क़िताब का
आख़िरी सफ़ा ख़ाली न भर जाए।
और उस रात मुझे समझ आया,
इंतज़ार ख़त्म नहीं होता, बदल जाता है।
किसी के लिए शुरू हुआ था,
अब अपने लिए बाक़ी है।
अब मैं इंतज़ार से आगे निकल आया हूँ,
जहाँ हर सुबह अपनी है,
और हर रात एक नज़्म।